Sri Rama Bhujangam विशुद्धं परं सच्चिदानन्दरूपं गुणाधारमाधारहीनं वरेण्यम् । महान्तं विभान्तं गुहान्तं गुणान्तं सुखान्तं स्वयं धाम रामं प्रपद्ये ॥ 1 ॥ मैं उस भगवान राम की शरण लेता हूँ—जो सर्वथा विशुद्ध हैं, जो सच्चिदानन्दरूप (सत्–चित्–आनन्द स्वरूप) हैं, जो गुणों का आधार हैं, पर स्वयं किसी आधार पर आश्रित नहीं, जो श्रेष्ठ और वरणीय हैं, जो महान, सबमें प्रकाशमान, हृदय की गुहा (गहराई) में स्थित और गुणों के पार हैं, जिनके चरणों में परम सुख की प्राप्ति होती है,जो स्वयं ही धाम (परम प्रकाश) हैं। I worship that Rama, who is ever pure, Who is existence and fullness, Who is the support of gunas and himself does not have any support, Who is the greatest, Who cannot be divided, who is the end within himself, Who has countless gunas, Who is the ultimate pleasure, And who himself is the abode. शिवं नित्यमेकं विभुं तारकाख्यं सुखाकारमाकारशून्यं सुमान्यम् । महेशं कलेशं सुरेशं परेशं नरेशं निरीशं महीशं प्रपद्ये ॥ 2 ॥ मैं उस भगवान शिव की शरण लेता हूँ, जो सदा शाश्वत, एकमात्र, सर्वव्यापी और तारक नाम से प्रसिद्ध हैं, जो परम आनन्दस्वरूप हैं परंतु स्वयं किसी आकार या रूप से बंधे नहीं हैं। वे देवताओं द्वारा पूज्यनीय हैं, समस्त लोकों के स्वामी महेश्वर हैं, जो दुःखों का नाश करने वाले और संसार के कष्टों से मुक्त कराने वाले हैं। वे देवताओं के ईश्वर, मनुष्यों के अधिपति, और समस्त जगत् के परमेश्वर हैं। वे ऐसे प्रभु हैं जो किसी पर आश्रित नहीं, स्वयंसिद्ध और सर्वाधार हैं। पृथ्वी सहित सम्पूर्ण विश्व जिन पर टिका है, ऐसे महेश्वर शिव को मैं बार-बार प्रणाम करता हूँ और उनकी शरण ग्रहण करता हूँ। I worship that Rama, who is the lord of this earth, Who is eternal, who is always one and all pervasive, Who is the way to cross the ocean of life, Who is in the form of sukha itself, Who does not have any form, Who is well respected, Who is the greatest god, Who is god of all arts, who is the lord of devas, Who is the lord of the ultimate, Who is the Isha of humans, And who is one who does not have any Lord. यदावर्णयत्कर्णमूलेऽन्तकाले शिवो राम रामेति रामेति काश्याम् । तदेकं परं तारकब्रह्मरूपं भजेऽहं भजेऽहं भजेऽहं भजेऽहम् ॥ 3 ॥ मैं उस परम तत्व की बार-बार उपासना करता हूँ, जो तारक-ब्रह्म स्वरूप है। जब प्रलय या मृत्यु का समय आता है और काशी नगरी में रहने वाला जीव अंतिम साँसें ले रहा होता है, तब स्वयं भगवान शिव उसके कान के पास जाकर “राम-राम, राम-राम” का नाम उच्चारण करते हैं। वही राम नाम वास्तव में तारक-मंत्र है, जो जीव को जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त कर परम मोक्ष प्रदान करता है। इस श्लोक में कहा गया है कि शिव स्वयं भी मोक्ष के समय रामनाम का उपदेश देते हैं, क्योंकि राम ही परब्रह्म हैं और रामनाम ही वह अमोघ नौका है जो जीव को संसार-सागर से पार कराती है। अतः मैं उस एकमात्र परम तारक-ब्रह्म स्वरूप का निरंतर ध्यान और भजन करता हूँ। When it is said that at the time of death in Kashi, Lord Shiva whisper in the ear,– Rama, Rama, Rama To that one ultimate form of Taraka Brahma, I worship you. I worship you. I worship you. I worship you. महारत्नपीठे शुभे कल्पमूले सुखासीनमादित्यकोटिप्रकाशम् । सदा जानकी लक्ष्मणोपेतमेकंसदा रामचन्द्रं भजेऽहं भजेऽहम् ॥ 4 ॥ मैं उस भगवान श्रीराम का बार-बार भजन करता हूँ, जो दिव्य महारत्नों से निर्मित सिंहासन पर सुशोभित रहते हैं, कल्पवृक्ष की छाया में सुखपूर्वक विराजमान हैं और जिनका तेज़ करोड़ों सूर्य के प्रकाश के समान जगमगाता है। वे कभी अकेले नहीं हैं—सदैव उनके साथ माता सीता जी विराजती हैं और आज्ञाकारी भ्राता लक्ष्मणजी सेवामें उपस्थित रहते हैं। यह दृश्य भक्त के हृदय में परम आनन्द और शांति का संचार करता है, क्योंकि उसमें ईश्वर का शाश्वत दिव्य ऐश्वर्य, करुणा और भक्तवत्सलता प्रतिबिंबित होती है। श्रीरामचन्द्र का स्मरण करने से साधक को यह अनुभव होता है कि वे न केवल त्रेतायुग के अयोध्यापति हैं बल्कि सनातन काल से अनादि-अनंत परमात्मा के रूप में महारत्न-मंडित पीठ पर आसीन हैं और समस्त जगत् को प्रकाशमान कर रहे हैं। अतः मैं उन्हीं श्रीरामचन्द्रजी का बार-बार ध्यान, जप और भजन करता हूँ। I always worship and worship that Ramachandra, Who sits on the bejeweled throne, Below the wish giving tree, sitting comfortably, With the luster of billions of suns, Always served by Sita and Lakshmana. क्वणद्रत्नमञ्जीरपादारविन्दं लसन्मेखलाचारुपीताम्बराढ्यम् । महारत्नहारोल्लसत्कौस्तुभाङ्गं नदच्चञ्चरीमञ्जरीलोलमालम् ॥ 5 ॥ मैं भगवान श्रीराम के उस मनोहर स्वरूप का ध्यान करता हूँ जिनके चरण-कमल रत्नजटित मंजीरों की मधुर झंकार से गूँजते हैं। उनके शरीर पर सुनहरी मेखला (कमरबंध) और पीताम्बर अलंकारित शोभा बढ़ाते हैं। उनके वक्षस्थल पर दिव्य महारत्नों का हार लटक रहा है और उस पर कौस्तुभ मणि की आभा अद्भुत रूप से चमक रही है। गले में सुगंधित पुष्पों की माला है, जिस पर भौंरों की टोलियाँ गुंजार कर रही हैं, मानो स्वयं प्रकृति भी उनके सौंदर्य का रसास्वादन कर रही हो। इस श्लोक में श्रीराम के ऐश्वर्य और सौम्य रूप का अत्यंत सुंदर चित्रण है—जहाँ उनकी दिव्यता और भव्यता दोनों ही झलकती हैं। ऐसे श्रीराम का ध्यान करने मात्र से हृदय में भक्ति, शांति और आनंद की धारा प्रवाहित होने लगती है। I worship that Ramachandra, Whose lotus feet are adorned by jingling anklets, Who adorns himself with red silk tied by golden belt, Who wears garlands of great gems and Koustubha, And also flower garlands attracted by bees. लसच्चन्द्रिकास्मेरशोणाधराभं समुद्यत्पतङ्गेन्दुकोटिप्रकाशम् । नमद्ब्रह्मरुद्रादिकोटीररत्न स्फुरत्कान्तिनीराजनाराधिताङ्घ्रिम् ॥ 6 ॥ मैं उन भगवान श्रीराम को नमन करता हूँ, जिनके अधर (ओष्ठ) रक्तवर्णी होकर खिले हुए चन्द्रमा की चाँदनी की भाँति शोभायमान हैं। उनका तेज़ उदित होते हुए सूर्य और असंख्य चन्द्रमाओं के प्रकाश से भी कहीं अधिक ज्योतिर्मय है। उनके चरणों की पूजा स्वयं ब्रह्मा, रुद्र और असंख्य देवगण करते हैं। जब देवता अपने मस्तक के मुकुटों में जड़े रत्नों को झुकाकर उनकी आराधना करते हैं, तब उन रत्नों से निकलने वाली झिलमिलाती प्रभा एक दिव्य आरती का रूप ले लेती है। यह दृश्य दर्शाता है कि भगवान श्रीराम केवल पृथ्वी के नायक नहीं, बल्कि समस्त लोकों के स्वामी और देवताओं द्वारा पूज्य